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आखिर क्यों है रविवार हमसे नाराज ?

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  रविवार आपसे कुछ कहना चाहता है ! Sunday wants to say something to you!           नमस्कार दोस्तों, मैं इतवार हूँ , आप लोग मुझे Sunday के नाम से भी जानते होंगे.. सन 1843 तक बाकि के 6 दिनों जैसा आम (फल वाला नहीं, केजरीवाल वाला) सा दिन था परंतु इसके बाद मेरी जिंदगी ही बदल गयी , अंग्रेजो ने कूटनीति से मुझे अवकाश घोषित करके मुझमे और मेरे बाकि के 6 भाइयों में फूट डाल दी , कुछ दिन हमारे झगडे चले पर अब सुलह हो गयी है क्योंकि अब हम इंसान थोड़ी है जो अंग्रेजो के गाड़े खूंटो के लिए  अभी तक लड़ते रहे, फिर क्या था मैं एका एक सबका चहेता बन गया... पहले जब मेरे आने से किसी को फर्क नहीं पड़ता था अब सब मेरा ही इंतजार करने लगे... मेरे आने से सबसे ज्यादा खुश बच्चे होते है, क्योंकि उन्हें न तो सुबह जल्दी उठ कर स्कूल जाना होता है और ऊपर से खेलने के लिए ढेर सारा वक्त मिल जाता है वह अलग ,कामकाजी पुरुष आराम से उठते है और फिर दिनभर ऐसे सुस्ताते रहते है जैसे उन्हें राहुल गाँधी जी जैसा जबरजस्ती संसद में बैठना पड़ रहा हो, प...

क्यों आपकी और हमारी वजह से डूब रही पंचायते, जानें ?

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ग्राम पंचायतें : भारतीय राजनितिक तंत्र का डूबता जहाज गाँधी जी ने आजादी के वक्त ग्राम पंचायतों को भारत के तंत्र की नींव बनाने की वकालत की थी परंतु तब उनके सुझावों पर अमल नहीं किया गया पर जब आगे जाकर जब पंचायत का महत्त्व समझ आया तो इसे 1992 में संविधान में जोड़ लिया गया... आज का सवाल यही है कि क्या ग्राम पंचायतें अपने उद्देश्य में सफल हो पायी ??? और अगर आप भारत के गाँवों में जरा सा झाँक के देखोगे तो गांव आपको खुद चीखते हुए जवाब "ना" में देंगे .... आज ग्राम पंचायतें गबन करते पैसे हजम करने का अड्डा बन चुकी है..... नई सोच के साथ आगे बढ़ना तो दूर की बात इतने वर्षों में यह गांवों में पानी और सड़क जैसी मुलभुत सुविधाएं भी पूरी तरह से नहीं पहुँचा पायी..... आइये पहले ग्राम पंचायत के बारे में जानते है उसके बाद इस बारे में और बात करेंगे READ MORE :  क्या सच में इस प्रदुषण को लेकर किसान इतना जिम्मेदार है ? राज्य सरकारों के बावजूद ग्राम पंचायतों की जरुरत क्यों जैसा की आप सब जानते है कि भारत एक लोकतान्त्रिक देश है और लोकतांत्रिक देश होने के कारण यहाँ की सारी शक...

कहानी : कागज की नाव और बचपन

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                     "कागज की नाव और बचपन" छोटा था तब मैं कागज की नाव में अपना बचपन बिठा कर बारिश के बहते पानी में छोड़ देता था, समझ थी नहीं... तो नाव मजबूत बनती नहीं थी , कुछ दूर जाकर डूब जाती थी...बचपन पानी में लुढक जाता था मैं भी मजे से उसी पानी में मस्ती करते हुए अपना बचपन वापस उठा लाता था और फिर इंतजार करता था अगली बारिश का... हर बार यही होता.... पर धीरे धीरे मैं बड़ा हो गया मुझे नाव बनाना अच्छे से आ गयी.. एक दिन फिर बारिश आयी मैंने नाव बनायी और फिर से बचपन बिठा के छोड़ दिया पानी में पर यह क्या अबकी बार नाव डूबी ही नहीं वह तो सरपट आगे निकल गयी थी ... पानी के तेज़ बहाव के साथ ... अब वह नाव तो निकल गयी.. बचपन भी निकल गया... पीछे रह गया मैं अकेला... अभी भी वही हूँ,  सोच रहा हूँ की .......क्या गलती कर दी थी बड़ा होकर.... पर जो भी है अब है .... वैसे आपको पहली बारिश मुबारक🙂 -शुभम जाट